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आमधारणा यही है की घर में रहने वाली महिलाएं कुछ नहीं करती बीते सालों में इतना बदलाव जरूर हुआ है की हाउसवाइफ से वो होम मकर कहलन लगी है मगर जितना कुछ भी अपने परिवार के लिए करती है उसका शीला और सम्मान उन्हें कभी नहीं मिल पता और जब कभी वह अपनी ख्वाहिश की बात करती है तो सेल्फिश कार दे दी जाति है तो दोस्तों आज हम एक ऐसी फिल्म को एक्सप्लेन करने जा रहे हैं जिसका नाम सुखी है वीडियो को शुरू करते हैं और अगर वीडियो अच्छा लगे तो वीडियो को लाइक जरूर कीजिएगा और इसी तरह के वीडियो अपने के लिए आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कीजिएगा ताकि आपको इसी तरह के लेटेस्ट और फ्रेंड्स कांटेक्ट मिलते हैं तो फिल्म की कहानी शुरू होती है 38 साल की सुखी से सुखी घर परिवार को समर्पित एक खुशनुमा ग्रहणी है जो 10th में पढ़ने वाली अपनी किशोर बेटी जैसी और

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कंबल का बिजनेस करने वाले पति गुरु और बूढ़े बीमा ससुर की जिम्मेदारियां के बीच खुद को भूल चुकी है यह वही चुकी है जो एक समय मैं अपने स्कूल कॉलेज की सबसे बेवकूफ और बिंदास लड़की हुआ करती थी बाइक और हॉर्स रीडिंग में माहिर फैशन और स्टाइल में आगे रहने वाली सकी ने अपनी माता पिता को बताए फिर शादी कर ली थी और बदले में खामियां चाहिए भुगतना पड़ा की उन्होंने सुखी से नता ही तोड़ ली तो अब सुखी पुरी तरह से हाउसवाइफ बन चुकी है उसके घर में पति उसके ससुर जी और उसकी बेटी ही अब उसकी पुरी दुनिया है सुबह से लेकर शाम तक कम करने वाली सुखी कभी-कभी इतना ज्यादा परेशान हो जाति है की वो अपने स्कूल और कॉलेज के दोनों को बहुत ज्यादा याद करती है लेकिन इन सब के चक्कर में वो अपना बेबाक और बिंदास वाला करैक्टर भूल चुकी है और उसने इस लाइफ को पुरी तरह से

 

एक्सेप्ट कर लिया है तो घर में ससुर जी जो है वो अक्सर बीमा रहते हैं लेकिन घर में सिर्फ वही एक लौटे शख्स हैं जो की सुखी को बहुत ही अच्छे से समझते हैं बाकी उसके पति गुरु और जैसी सुखी से ठीक से बात नहीं करते हैं और हमेशा वह से याद दिलाते रहते हैं की वो सिर्फ हाउसवाइफ है और उसका कम इस घर में कम करने का है और सुखी के पड़ोस में ही उसकी पड़ोसन रहती है जो की सुखी को हमेशा परेशान करते रहती है और सुखी उससे बस पीछा छुड़ाना चाहती है और कभी-कभी खुशी के अंदर वही बेबाक और बिंदास करैक्टर जग जाता है इसी वजह से वो गड़बड़ भी कर देती जाति है और हाल ही में उसने गड़बड़ की है क्योंकि कॉलोनी की एक लड़की भाग चुकी है और सबको ऐसा लगता है की उसे भागने में सुखी ने उसकी मदद की है लेकिन वो लोग ये नहीं जानते हैं की सुखी एन उसकी मदद नहीं की है

 

बल्कि उसने तो सिर्फ कब बुक की थी और सुखी को तो बिल्कुल भी नहीं मालूम था की वो लड़की भाग रही है लेकिन ये सब चीज हो जान की वजह से यहां पर सुखी के पति गुरु उसे बहुत चिल्लाते हैं लेकिन सुखी शांत रहती है और कोई भी जवाब नहीं देती है जिसके बाद वो अपने ससुर जी के पास जाति है उन्हें साड़ी बातें बताती है ससुर जी हमेशा सुखी से कहते रहते हैं की वो अपनी ऊपर भी थोड़ा ध्यान दें और अपनी लाइफ को भी इंजॉय करें और फिर एक दिन उसके पास एक मेल आता है वह मेल था क्लास ऑफ 1997 के रियूनियन का उसे बात के सभी लोग वहां पर आने वाले थे लेकिन वो फंक्शन जो है वो दिल्ली में होने वाला था और सुखविज जो है वो पंजाब में रहती है लेकिन तभी सुखी को पुराने कुछ मोमेंट्स याद आने लगता हैं और वो नहीं याद करके बहुत खुश होती है क्योंकि सुखी उसे जमाने में बहुत ज्यादा एंजॉय किया करती थी और सुखी सबकी फेवरेट थी लेकिन इस यूनियन के बड़े में वो अपने पति से बात भी नहीं करना चाहती है क्योंकि उसे मालूम है की वो

 

हमेशा की तरह माना ही करेंगे लेकिन इसके बड़े में वो अपने ससुर जी से जरूर चर्चा करती है और ससुर जी उसे आइडिया देते हैं की उसे जाना चाहिए क्योंकि उसके पास सिर्फ एक ही मौका है इस लाइव को थोड़ा एंजॉय करने का और अगर ये मौका भी चक गया तो वो बहुत सालों तक इंजॉय नहीं कर पाएगी तो वो सोचती है की उसे अपने पति को रियूनियन के बड़े में बता देना चाहिए जिसके बाद हम देखते हैं की जैसी का स्कूल में एक प्रेजेंटेशन था और उसे प्रेजेंटेशन को तैयार करने में सुखी भी उसकी बहुत मदद करती है जेसिका प्रेजेंटेशन इतना अच्छा था की उसे फर्स्ट प्राइस मिलता है और ये देख कर तो सुखी बहुत ज्यादा खुश होती है और साइड में खड़ी होकर बहुत ज्यादा चीर अप करती है और ट अभी बजा रही थी लेकिन यह सब देख कर जैसी को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है वो कहती है की अगर आप ऐसा सब करोगी तो बाकी के

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सारे स्टूडेंट मेरा मजाक उड़ाएंगे आगे से आप ऐसा नहीं करेंगे यह वादा करो तो गुरु का जो कंबल का बिजनेस होता है वो ठीक ढंग से नहीं चल रहा था इसलिए उन्होंने एक बंदे को हर किया था और उसे पार्टी में बुलाया था लेकिन यहां पर भी कुछ गड़बड़ हो जाति है और इस गड़बड़ के पीछे सुखी खाई हाथ था इसलिए गुरु उसे बहुत चिल्लाता है अब सुखी अपने ससुर जी को बताती है की वो अपने पति को यूनियन के बड़े में नहीं बता शक्ति क्योंकि अभी वैसे ही माहौल ठीक नहीं है और अगर वो उन्हें बताएं की तो वो हमेशा की तरह चढ़ जाएंगे और मेरे ऊपर चिल्लाएंगे तो ससुर जी उससे कहते हैं की तुम्हें अपने पति से पूछना नहीं है बल्कि बताना है की मैं दिल्ली जा रही हूं अब आगे हम देखते हैं की सुखी जो है वो वीडियो कॉल पर अपने कॉलेज की दोस्तों से बात कर रही होती है सभी लोग बहुत ज्यादा एक्साइड थी की ये यूनियन होने वाला है और

 

उससे भी ज्यादा वो इस बात से एक्साइड थे की सुखी भी वहां पर ए रही है सुखी की तीनों दोस्त बाहर रहती है इसके बावजूद वह यहां पर ए रही थी तो सुखी का भी मां हो जाता है वहां पर जान का लेकिन एक दिन अचानक से ससुर जी की डेथ हो जाति है और ये देख कर सुखी के परिवार का बहुत ज्यादा बड़ा हाल था और सबसे ज्यादा बड़ा हाल था सुखी का क्योंकि सुखी को सबसे ज्यादा उसके ससुर जी ही समझते थे उसे दिन ऐसे ही गुर्जर जाते हैं ससुर जी को गुजरे हुए 15 दिन हो चुके थे और फिर एक दिन सुखी अपने पति को बता देती है की वो दिल्ली

 

जाकर कॉलेज के रियूनियन में शामिल होना चाहती है ये सुनते से ही गुरु यहां पर सुखी को बहुत चिल्लाता है वो कहता है की अभी मेरे पिताजी को गुजरे हुए सिर्फ और सिर्फ 15 दिन हुए हैं और तुम्हें दिल्ली जाकर वहां पर मौज मस्ती करनी है लेकिन यहां पर सुखी उससे कहती है ससुर जी भी चाहते थे की मैं उसे रियूनियन में शामिल हूं इसलिए उन्होंने मेरी टिकट करवा कर राखी थी जिसके बड़े में भी मुझे अभी मालूम चला मैं इस लाइफ से पुरी तरह से बर हो चुकी हूं कम से कम मुझे अपनी लाइफ के लिए दो दिन तो मिल ही सकते हैं लेकिन गुरु यहां पर सुखी से सांप माना कर देता है वह कहता है की तुम कहानी पर भी नहीं जान वाली लेकिन सुखी ने यहां पर अपने पति गुरु की बटन को पुरी तरह से अनदेखा कर दिया था और फिर अगले ही दिन की ट्रेन से दिल्ली पहुंच जाति है और वह भी अपने पति को बिना बताए और अगली सुबह जैसी

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और गुरु को मालूम चला है की सुखी घर पर नहीं है और उन्हें मालूम चला है की सुखी दरअसल में दिल्ली जा चुकी है और जब सुखी स्टेशन के बाहर खड़ी हुई थी तभी यहां पर उसकी पछता आई है फूल रफ्तार में कर को लेकर और उसे दोस्त का नाम था मैहर मैहर यहां पर सुखी की बहुत ही अच्छी दोस्त है और उनके बैच में इस की सबसे कम आगे है लेकिन फिर भी वो उनके साथ बहुत अच्छे से गुली मिली है और वो अभी भी बहुत ही ज्यादा बिंदास तरीके से अपनी लाइफ को एंजॉय कर रही है जिसके बाद सुखी अपनी बाकी के दो दोस्तों से मिलती है और उनके साथ मिलते ही वो इंजॉय करना शुरू कर देती है मानो जैसे उनके पुराने दिन लोट आए सुखी को यहां पर देख कर वो लोग बहुत खुश थी

 

क्योंकि उन्हें ऐसा ग रहा था की सुखी यहां पर नहीं आएगी जिसके बाद वो रियूनियन की तैयारी करने लगती है और यहां पर सभी लोग सभी यूनियन के लिए बहुत ही ज्यादा एक्साइड थे तो अगले दिन सभी लोग बहुत ज्यादा तैयार होकर उसे रियूनियन में पहुंचने हैं और जब वो यहां पर अपने बैच के लड़कों को देखते है तो वो पुरी तरह से हैरान थी क्योंकि सभी लोग बुद्ध हो चुके थे और ये देख कर उन्हें बहुत ही ज्यादा बड़ा लगा था तभी यहां पर एंट्री होती है सुखी अभी भी पुरी तरह से जवान थी और पहले की तरह ही सभी लोग उसके ऊपर लट्टू हो जाते हैं यहां पर सुखी अपने तो दोस्तों के साथ एंजॉय करती है और तभी आप एंट्री होती है विक्रम की विक्रम मनी के कॉलेज का एक लोटा ऐसा लड़का था जो की हमेशा सुखी से प्यार करता था और उसे वो लोग चमगादड़ बुलाया करते थे यहां दूसरी तरफ सुखी के घर पर बहुत बड़ा हाल था क्योंकि

 

खाने पीने के लिए उनके पास ज्यादा कुछ नहीं था और ना ज्यादा कुछ बनाना भी नहीं आता था इसलिए जैसी और गुरु सुखी को वापस आने के लिए कहते हैं क्योंकि उन्हें हर रोज बर्गर खाना पड़ता है हालांकि उनकी पड़ोसन थोड़ी बहुत मदद कर देती है और कुछ ना कुछ खाने के लिए दे देती है लेकिन बात यह फेल रही थी की सभी को ये बात मालूम चल गई थी की दरअसल में सुखी जो है वो दिल्ली में एक पार्टी करने के लिए गई है लेकिन इन सभी चीजों के वजह से जैसी और गुरु के बीच में नजदीकी ए गई थी वो दोनों एक दूसरे को बहुत अच्छे से समझना लगे थे और उन्हें एक बहुत बड़ा सबक लगा था की अगर सुखी इस फैमिली में नहीं होगी तो यह फैमिली कभी भी सुखी नहीं रहेगी इसलिए वो किसी भी तरह से सुखी को बस वापस जाते थे इसलिए गुरु यहां पर सुखी के पास कॉल करता है और उसे फौरन ही वापस आने के लिए कहता है

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लेकिन उससे कहती है की दिल्ली में ही उसके माता-पिता भी रहते हैं और वह चाहती है की एक बार वो उनसे मिलकर आए लेकिन यहां पर गुरु माना करता है और फौरन यहां पर आने के लिए कहता है और इसी वजह से उनकी बीच में एक ऐसा सॉलिड झगड़ा होता है की गुरु के मुंह से निकाल जाता है की आज के बाद घर में आने की कोई भी जरूर नहीं है ये सुनने के बाद सुखी को बहुत ज्यादा बड़ा लगा था क्योंकि जी इंसान के लिए उसने अपनी पुरी फैमिली को छोड़कर यहां पर आई थी आज उसका पति ही उसे छोड़ रहा है जी वजह से उसे बहुत ज्यादा गुस्सा आता है और वो एक हॉर्स को काबू करने के लिए पहुंच जाति है यहां पर वह हॉर्स रीडिंग करती है जैसे वो पहले किया करती थी और अपने दोस्तों के साथ भी खूब इंजॉय करती है जैसे की वो कॉलेज के दोनों में किया करती थी मानव जैसे यहां पर सुखी का वो सुखी वाला

 

करैक्टर वापस ए रहा था और कॉलेज में जी तरह से बड़ा करती थी अब वो इस तरह से रहती है और अब आगे हम देखते हैं की हॉर्स रीडिंग की रेस थी और इस रेस में यहां पर सुखी नेवी पार्टिसिपेट किया था तो शुरू होती है और उसके सारे दोस्त भी बाहर बैठे हुए थे और वो यहां पर पोस्ट आई है और इस रेस को देखने के लिए यहां पर सुखी के पिता भी आए हुए थे उन्होंने सुखी की साड़ी गलतियां को माफ कर दिया था और अपने घर पर रख लिया था लेकिन यहां पर गुरु को अपनी गलती का एहसास हो जाता है और वो समझ जाता है की सुखी के बिना तो वो बिल्कुल भी नहीं र सकता इसलिए वो यहां पर उसके पिता के घर पर जाता है और सुखी को वापस लता है जिसके बाद वो अपनी फैमिली में सुखी सुखी रहने लगता हैं तो दोस्तों महिलाओं के मसलों को लेकर एक आर्स से फिल्में बनाई जा रही है और कई संगीत मुद्दों को फिल्म में

 

रेखांकित किया जा रहा है इस बार निर्देशक सोनल जोशी ने हाउसवाइफ की चुनौतियां और व्यथा को कहानी का आधार बनाया है जो काफी प्रासंगिक है काफी हद तक हाउसवाइफ इससे रिलेटेड भी करेगी सोनल कहानी को बहुत ही रियलिस्टिक अंदाज में शुरू करती है और महिला मुद्दों की बात हल्के फुल्के ढंग से करती है मध्यांतर तक कहानी सुगमता से आगे बढ़नी है मगर फिर इंटरवल के बाद लड़खड़ा जाति है लेखक राधिका राधिका और उपेंद्र इंद्रजीत द्वारा लिखित कहानी का स्क्रीनप्ले काफी कमजोर है हालांकि कुछ डायनासोर संवाद अच्छे बन पड़े मगर सुखी के दोस्तों का ट्रैक डपका लगता है उनके जीवन की जद्दोजहद को स्थापित नहीं किया गया है अमित के साथ शिल्पा शेट्टी के लव

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ट्रैक में भी डेथ की कमी बहुत ज्यादा नजर आई है हालांकि शिल्पा शेट्टी के पारिवारिक दृश्य यादगार बन पड़े हैं जैसे सुखी का अपने ससुर के साथ रिलेशनशिप पिता पुत्री के सीन खास तोर पर बेटी के साथ मेडिकल जाकर बेड खरीदने वाला दृश्य तकनीकी पक्ष की बात की जाए तो फिल्म थोड़ी कतरी जा शक्ति थी जैसे की फोटोग्राफी आर्ट इन दिल्ली को खूबसूरत से कैप्चर किया है क्लाइमैक्स सुखद है फिल्म का संगीत पक्ष उतना मजबूत नहीं है और अभिनय के मामले में शिल्पा शेट्टी की भूमिका बहुत ही ज्यादा परफेक्ट है उन्होंने अपने किरदार में जान दाल दी है और बड़े पर्दे पर उनकी वापसी सुखद गुरु के रूप में चेतन चौधरी ने बहुत अच्छा कम किया है उन्होंने अपनी भूमिका को खूबसूरती से

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निभाया है हमें साथ की भूमिका को विस्तार दिया जाना चाहिए था हालांकि वे अपने रोल में जाच हैं और एक पुरानी कहावत है की आदमी घर चलता है और औरत पुरी दुनिया चलती है पति पत्नी जीवन के दो पहिए के समाज होते हैं अगर इसमें से एक पहिया कमजोर बाढ़ जाए तो जिंदगी उथल-पुथल हो जाति है कभी-कभी पुरुष को इस बात का गुमान हो जाता है की घर तो वह चला रहा है जबकि महिलाएं क्या करती है लेकिन किसी कारणवश अगर एक पत्नी कुछ समय के लिए किसी कारणवश कुछ समय के लिए दूर चली जाति है तब उसे इस बात का एहसास होता है की पत्नी घर और परिवार को कैसे अपनी छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज करके संभालती है सुखी ऐसी एक महिला

 

सुखप्रीत सुखी कलर की कहानी है जो अपनी छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज करके अपने पति और बेटी की छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान देती है लेकिन जब रिश्तो के बीच हम का टकराव होता है तो खुशाल जिंदगी में कड़वाहट पैदा हो जाति है सुखी की कहानी 4 महिला पत्रों के इर्द-गिर्द घूमती है सबकी अपने अलग-अलग कहानी है शादी के 20 साल के बाद जब सुखी अपने कॉलेज के दोस्तों से मिलने के लिए आनंदपुर से दिल्ली 2 दिन के लिए अपने पति से यह का कर जाति है की उसे थोड़ा सा ब्रेक चाहिए यहां से उसके पति का अहंकार जग जाता है और उसे लगता है की आदमी बिना ब्रेक के घर चलता है और औरत को लगता है की घर के कम से ठक्कर ब्रेक चाहिए सुखी अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध गुरु से शादी की थी उसके पिता कहते हैं की जिंदगी का फैसला बिना बताए कर लिया अब जिंदगी भी अकेले ही गुर्जर नहीं होगी मां-बाप से सुखी के रिश्ते पहले से ही खराब है मैं अपने दोस्तों से मिलकर कॉलेज के दोनों की याद को ताज करके कुछ पाल के लिए

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खुशियां चाहती है और फिल्म खुशी को राधिका आनंद पोलो में दत्ता और रूपेंद्र इंद्रजीत ने मिलकर लिखा है कहानी का जो प्लॉट उन्होंने चुनाव है वो बहुत ही अच्छा है फिल्म के ऐसे कई दरअसल जो भावुक कर सकते हैं लेकिन कमजोर पटकथा के चलते कहानी बीच-बीच में अपना असर छोड़ देती है कहानी की शुरुआत अच्छी होती है बाद में ये कहानी एकता कपूर की धारावाहिक के ट्रैक पर ए जाति है तो बोझिल होने लगती है पति और पत्नी के बीच छोटी-मोटी बटन को लेकर मनमुटाव हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं की वह महिला किसी और पुरुष की तरफ आकर्षित हो जाए किसी के प्रति प्रेम और आकर्षण में बहुत बड़ा अंतर होता है इस अंतर को समझकर एक बहुत ही

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खूबसूरत और भावनात्मक कहानी कहीं जा शक्ति है और फिल्म तमाशा और धूम 3 में सहायक निर्देशक के रूप में कम कर चुकी सोनल जोशी की यह बताओ निर्देशक पहले फिल्म है उनके उस्ताद रहे विजय कृष्णा आचार्य भी इसी शुक्रवार को अपनी कॉमेडी फिल्म डी ग्रेट इंडियन फैमिली लेकर ए रहे हैं सोनल को अभी निर्देशक की बारीकी सीखने की बहुत जरूर है उन्होंने एक अच्छी कहानी मिल गई फिल्म के निर्माण टी सीरीज है और जलसा और शेरनी जैसी फिल्मों का निर्माण कर चुके निर्माता विक्रम मल्होत्रा का साथ मिला शिल्पा शेट्टी जैसी अभिनेत्री मिली फिर भी एक अच्छी फिल्म बनाने से चक गई ठीक इस तरह जिसे किसी को को खाना बनाने के लिए सारे सामग्री मिल जाए

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और वह स्वादिष्ट भजन ना बना पे हां फिल्म में आप बेटी की भावनात्मक संबंध को अच्छी तरह से दिखाए है लेकिन फिल्म के ऐसे दृश्य अगर सही सिचुएशन पर आते तो उसका कुछ अलग ही असर होता और इसी के साथ यह फिल्म यही पर खत्म होती है तो दोस्तों उम्मीद करता हूं आपको वीडियो पसंद आई होगी वीडियो पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक जरूर कीजिएगा और इसी तरह के वीडियो अपने के लिए आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब लेटेस्ट और फ्रेंड्स कांटेक्ट मिलते रहे मिलते एक और कमल की वीडियो के साथ तब तक के लिए आप हमारे चैनल के साथ बने रहिए धन्यवाद जय हिंद जय भारत जय श्री राम

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